ये कहानी सिर्फ़ मंगल कुंजाम की नहीं है उनके आसपास के गावों में भी
ग्रामीणों ने मतदान नहीं किया. जैसे - हिरोली, समलवार, लावागांव आदि.
पिछले
तीन विधासभा के आंकड़ों की अगर बात की जाए तो इन 18 सीटों पर वर्ष 2003 में 71.30 प्रतिशत मतदान हुआ था जबकि वर्ष 2008 में 70.51 प्रतिशत और 2013 में 77.02 प्रतिशत.
ये आंकड़े तब के हैं जब माओवादियों की कमर टूटने के दावे नहीं किये गए थे. इस बार जब नक्सली हिंसा में कमी बतायी गई और
सुरक्षाबलों की तादात भी बढ़ा दी गयी तो फिर पिछले तीन विधानसभा के चुनावों
की तुलना में सबसे कम मतदान होना प्रशासन और चुनाव आयोग के लिए चिंता की
बात ज़रूर है.
नाम नहीं बताने की शर्त पर बस्तर में तैनात वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि अंदरूनी इलाक़ों में पहुँच पाना ही अपने आप में बड़ी चुनौती है. ये पूरी चुनावी प्रक्रिया एक जंग की तैयारी जैसी ही है.
उनका
कहना था, "पांच साल में एक बार जाने से लोगों का विशवास कैसे हासिल कर
सकते हैं. सिर्फ मतदान के दिन हमारे अधिकारी और सुरक्षाबल उन इलाक़ों में जाते हैं जहां बाक़ी के पांच साल कोई नहीं जाता."
इस बार चुनाव का प्रतिशत 66 प्रतिशत तक अनुमानित है क्योंकि मंगलवार को
भी सुदूर अंचलों से मतदानकर्मियों के दलों के आने का सिलसिला जारी है.
अधिकारी
मानते हैं कि अगर बाद के ईवीएम मशीनों के परिणामों को भी जोड़ दिया जाए तो
ये आंकड़ा दो या तीन प्रतिशत तक और ऊपर जा सकता है.
शहरी इलाक़ों और
कस्बों में या फिर उच्च मार्गों के किनारे बसे गांव में तो मतदान का प्रतिशत हमेशा की तरह ठीक रहा. मगर सुदूर जंगली और दुर्गम इलाक़ों की कहानी
वैसी ही है जैसी 15 सालों पहले थी.
सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर में कई ऐसे बूथ हैं जहाँ एक भी वोट नहीं पड़ा जबकि कई ऐसे भी हैं जहां दहाई तक आंकड़ा नहीं पहुंचा.
बस्तर
के सात ज़िलों की 12 सीटों की बात की जाए तो इन सीटों पर अलग-अलग समय तय
था. जैसे बस्तर ज़िले, चित्रकूट और जगदलपुर में मतदान का समय सुबह आठ बजे
से शाम के पांच बजे तक का था.
मतदान की समाप्ति पर बस्तर में 80 प्रतिशत, जगदलपुर शहर में 73 प्रतिशत और चित्रकोट में 79 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया.
वहीं दूसरे घोर नक्सली क्षेत्रों में मतदान का समय सुबह सात बजे से दोपहर तीन बजे तक का था.
इन ज़िलों में सबसे कम मतदान बीजापुर में 33 प्रतिशत दर्ज दिया गया जबकि नारायणपुर में 39, कोंटा में 46, दंतेवाडा में 49, केशकाल में 63.51 और कोंडागांव में 61.47 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ.
अधिकारियों का दावा है कि इन सब के बावजूद कई ऐसे इलाक़े हैं जहां कभी मतदान नहीं हुआ करता था मगर इस बार वोट पड़े.
वह
सुकमा के सुदूर चिंतलनार के इलाक़े का उद्धरण देते हैं जहां वर्ष 2010 में हुए सबसे बड़े माओवादी हमले में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के 78 जवान मारे गए थे.
ये इलाक़े दुर्गम हैं और इसके आसपास के इलाक़ों में भी पहुंचा नहीं जा सकता है क्योंकि यहाँ बारूदी सुरंगों का जाल बिछा हुआ है.
चिंतलनार में इस बार 77 लोगों ने वोट डाले जबकि आसपास गुमोड़ी में 2, मिनपा में 8 और बुर्कापाल में 105 मत पड़े.
ये वो इलाक़े हैं जहां माओवादियों की समानांतर जनताना सरकार चलती है.
मंगल कुंजाम कहते हैं कि उनका परिवार पुश्त दर पुश्त इन इलाक़ों में रहता आया
है. अंदरूनी इलाके जैसे कई साल पहले हुआ करते थे, आज भी वैसे ही हैं.
वह कहते हैं "फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि पहले हम खुली हवा में सांस लेते थे, अब हवा और ज़मीन में बारूद है."
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